टीकेडीएल

परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी( टीकेडीएल)

अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों में देश के परंपरागत चिकित्सीय ज्ञान के दुरुपयोग को रोकने के लिए परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी भारत की अग्रणी पहल है जिस पर भारत की 70% से अधिक जनसंख्या की स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं और लाखों लोगों की आजीविका निर्भर है । इसकी शुरूआत यूएसपीटी में हल्दी के घाव भरने वाले गुणों पर पेटेंट के निरसन संबंधी भारत के प्रयास से बहुत पहले हुई है । इसके अतिरिक्त वर्ष 2005 में टीकेडीएल के विशेषज्ञ समूह ने अनुमान लगाया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिवर्ष भारतीय चिकित्सा प्रणालियों से संबंधित लगभग 2000 पेटेंट मुख्यतः इस तथ्य के कारण गलत स्वीकृत किए जा रहे थे कि स्थानीय भाषाओं यथा संस्कृत, हिंदी, अरबी, उर्दू, तमिल, आदि में मौजूद भारत का परंपरागत चिकित्सा ज्ञान न तो अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों के पेटेंट परीक्षकों के लिए उपलब्ध था और न उनके लिए बोधगम्य था ।

परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी ने सूचना प्रौद्योगिकी टूल्स और नवोन्मेषी वर्गीकरण प्रणाली-परंपरागत ज्ञान संसाधन वर्गीकरण (टीकेआरसी) की सहायता से भारतीय चिकित्सा प्रणालियों अर्थात आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और योग के प्राचीन पाठों के उपलब्ध विषयों (आज तक 0.29 लाख चिकित्सीय सूत्रणों) को 5 अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं नामश: अंग्रेजी, जापानी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश में वैज्ञानिक तौर पर परिवर्तित और निर्मित करके भाषा और फॉर्मेट संबंधी सीमाओं को समाप्त किया है ।

टीकेआरसी ने आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और योग हेतु लगभग 25,000 उपसमूहों में भारतीय परंपरागत चिकित्सा प्रणाली को गठित और वर्गीकृत किया है । टीकेआरसी ए 61के 35/00 के अंतर्गत औषधीय पादपों संबंधी पूर्व में उपलब्ध कुछ उपसमूहों के बजाय अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट वर्गीकरण में ए61के 36/00 के अंतर्गत लगभग 200 उपसमूहों को सम्मिलित करने में समर्थ हुआ है । जिससे परंपरागत ज्ञान के क्षेत्र में पेटेंट किए गए आवेदनों में प्रायर-आर्ट की खोज और जांच की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है ।

टीकेडीएल ने टीकेडीएल विनिर्देशों पर आधारित टीके डाटाबेसेस स्थापित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय विनिर्देश और मानक स्थापित किए है । इसे बौद्धिक संपदा और आनुवंशिक संसाधन, परंपरागत ज्ञान और लोक साहित्‍य अभिव्यक्ति पर डब्‍ल्‍यू आईपीओ की अंतरसरकारी समिति (आई जी सी) के पांचवे सत्र में समिति द्वारा वर्ष 2003 में अंगीकार किया गया ।

टीकेडीएल प्रौद्योगिकी ने विविध विषयों और भाषाओं यथा आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, योग, संस्कृत, अरबी, उर्दू, पारसी, तमिल, अंग्रेजी, जापानी, स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, आधुनिक विज्ञान एवं आधुनिक चिकित्सा को समाहित किया है । आज तक टीकेडीएल भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की 359 पुस्तकों पर आधारित है जो कि ओपन डोमेन में लगभग एक हजार अमेरिकी डॉलर की कीमत पर उपलब्ध हैं और ये राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी व्यक्ति/ संगठन द्वारा मंगाई जा सकती है । टीकेडीएल इन पुस्तकों और अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट परीक्षकों के बीच एक सेतु का कार्य करता है । टीकेडीएल प्रौद्योगिकी ने संस्कृत के सूक्तों को किसी अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालय के परीक्षक द्वारा अपने कंप्यूटर की स्क्रीन पर जर्मन, जापानी, अंग्रेजी, स्पेनिश और फ्रेंच जैसी भाषाओं में पढ़े जा सकने के लिए अद्वितीय तंत्र सृजित किया है ।

वर्तमान में आर्थिक मामलों विषयक मंत्रिमंडल समिति के अनुमोदन के अनुसार टीकेडीएल पहुंच (अप्रकटन करार) के अंतर्गत टीकेडीएल की पहुंच नौ अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों (यूरोपियन पेटेंट कार्यालय, यूनाइटेड स्टेट पेटेंट एंड ट्रेडमार्क कार्यालय, जापान पेटेंट कार्यालय, यूनाइटेड किंगडम पेटेंट कार्यालय, कैनेडियन इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी कार्यालय, जर्मन पेटेंट कार्यालय, बौद्धिक संपदा ऑस्ट्रेलिया, भारतीय पेटेंट कार्यालय और चिली पेटेंट कार्यालय) के लिए उपलब्ध है । रूस और मलेशिया के बौद्धिक संपदा कार्यालयों के साथ पहुंच करार करने के लिए बातचीत चल रही है । पहुंच करार के निबंधन एवं शर्तों के अनुसार पेटेंट कार्यालय के परीक्षक खोज और जांच प्रयोजनों के लिए ही टीकेडीएल का उपयोग कर सकते हैं और टीकेडीएल के विषयों को किसी तीसरी पार्टी को नहीं बताएंगे जब तक यह हवाला देने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हो । टीकेडीएल पहुंच करार का स्‍वरूप अद्धितीय है और इसमें किसी भी संभावित दुरुपयोग से भारत के हित को बचाने के लिए अप्रकटन संबंधी संरक्षण अंतर्निहित है ।

इसके अतिरिक्त, टीकेडीएल के प्रायर-आर्ट प्रमाणों सहित विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों में पेटेंट स्वीकृति पूर्व विरोध फाइल किए जाते हैं । इसका गहरा असर हुआ है । अब तक यूनाइटेड स्टेट्स, ग्रेट ब्रिटेन, स्पेन, इटली, चीन इत्यादि की फार्मास्यूटिकल कंपनियों के लगभग 200 पेटेंट आवेदनों को बिना किसी लागत के कुछ सप्ताह/माह की अवधि में टीकेडीएल के आंकड़ा आधार में मौजूद प्रायर-आर्ट प्रमाणों के आधार पर रद्द कर दिया गया है/वापस लिया गया है/ उनमें संशोधन किया गया है, जबकि एपीईडीए को बासमती चावल पेटेंट के कुछ दावों के प्रतिसंहरण हेतु लगभग सात करोड़ विधिक-शुल्क खर्च करना पड़ा था । इसी प्रकार लगभग 1200 और उन मामलों के परिणाम आने की संभावना है जिनमें टीकेडीएल ने पेटेंट स्वीकृति पूर्व विरोध फाइल किया है ।

टीकेडीएल ने जैव-चौर्य के विरुद्ध प्रभावी निवारक उपलब्ध कराया है और परंपरागत ज्ञान संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक लीडर के तौर पर इसको मान्यता दी जा रही है । वर्ष 2011 में सीएसआईआर के सहयोग से विश्व बौद्धिक संपदा संगठन डब्‍ल्‍यूआईपीओ द्वारा ‘परंपरागत ज्ञान के संरक्षण हेतु मॉडल के रूप में परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी का उपयोग’ पर नई दिल्ली में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया । इसके अनुसार में डब्‍ल्‍यूआईपीओ ने सीएसआईआर और डीआईपीपी (व्यापार और उद्योग मंत्रालय) के सहयोग से टीकेडीएल की प्रतिकृति में रुचि रखने वाले 19 राष्ट्रों के लिए टीकेडीएल हेतु ‘अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन दौरे’ का आयोजन किया ।

टीकेडीएल ने संपूर्ण विश्व में विशेष रुप से परंपरागत ज्ञान से समृद्ध राष्ट्रों में अग्र-सक्रिय कार्य और सुदृढ़ निवारक की शक्ति के लाभों का प्रदर्शन करके प्रभावशाली स्‍थान बनाया है । इसकी परंपरागत ज्ञान के लिए उपयोग को रोकने की नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पेटेंट परीक्षकों के लिए प्रायर-आर्ट की पहुंच की कमी के कारण गलत पेटेंट स्वीकृत न किए जाएं ।

किसी पेटेंट कार्यालय द्वारा टीकेडीएल पहुंच करार करने के लिए डॉ. राकेश तिवारी, प्रमुख, सीएसआईआर- परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी एकक(ई-मेल: tkdl@csir.res.in) से संपर्क किया जा सकता है ।